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कामशास्त्रम् – उद्गम, प्रयोजन और संदेश

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कामशास्त्रम् – उद्गम, प्रयोजन और संदेश
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परिचय

भारतीय संस्कृति में मनुष्य जीवन को चार पुरुषार्थों में विभाजित किया गया है – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष l काम का स्थान चार पुरुषार्थों में तीसरा है और अन्तिम पुरुषार्थ मोक्ष है जिसको जीवन का अन्तिम लक्ष्य कहा गया है l यथा धर्म के लिए धर्मशास्त्रों का, अर्थ के लिए अर्थशास्त्र का और मोक्षप्राप्ति के लिए मोक्ष के ग्रन्थों का अध्ययन आवश्यक है तथैव काम के ज्ञान और यथायोग्य विवेकजन्य प्रयोग के लिए कामशास्त्र का अध्ययन आवश्यक है l इस लेख में काम और कामशास्त्र को ध्यान में रखकर निम्नलिखित मुद्दों पे विवेचन प्रस्तुत है –

  • काम की व्युत्पत्ति और शास्त्रों में स्थान l
  • कामशास्त्र का उद्गम और प्रयोजन l
  • वात्स्यायन और कामसूत्र की रचना l
  • कामशास्त्र की ग्रन्थ परम्परा l
  • कामसुत्र का संदेश l
  • उपसंहार l

इस ग्रन्थ के पठन पर्यन्त यह अपेक्षा है कि पाठक काम और कामशास्त्र के उन बिन्दुओं से अवगत होगा जो सामान्यतया प्रकाश में नहीं आये हैं या उनको दबा दिया गया है और फलतः आज कामसूत्र को शास्त्र होते हुए भी घृणा या जुगुप्सा की दृष्टि से देखा जाता है l

काम की व्युत्पत्ति और शास्त्रों में स्थान

“कम् – कान्तौ” धातु से जन्य शब्द है काम l काम अर्थात् इच्छा[1] l जहाँ इच्छा वहाँ आकर्षण और यह आकर्षण ही समस्त संसार के अस्तित्व का मूल है l विज्ञान से यह सिद्ध है कि विश्व का प्रत्येक पदार्थ अन्य पदार्थ को आकर्षित करता है अतः आकर्षण जिसके मूल में है वह काम प्रत्येक पदार्थ में स्थित है l अमरकोश में काम को ‘मानसिक भाव’ की श्रेणी में रखा गया है l ऋग्वेद में काम को मन का वीर्य (रेतस् ) कहा गया है जो मानसिक भाव को प्रतिपादित करता है l [2]

वात्स्यायन प्रणीत कामसूत्र के अनुसार ज्ञानेन्द्रियों का (कर्ण, त्वचा, नेत्र, जिह्वा, नासिका), अपने अपने विषय में (क्रमशः शब्द, स्पर्श, रूप, रस, गन्ध), अनुकूल रूप में, प्रवृत्त होना अर्थात् काम l [3] यहाँ काम की व्याख्या में वात्स्यायन स्पष्ट है l वह काम को केवल शारीरिक सुख या वासना नहीं बताते l

काम के मुख्य दो प्रकार मिलते हैं – लौकिक और अलौकिक l लौकिक काम में मुख्य रूप से शारीरिक सुख और गौणरूप से अन्य इच्छा का समावेश होता है l अलौकिक काम की श्रेणी में दिव्यकर्म की इच्छा और कभी देवों की इच्छाओं को भी रखा जा सकता हैं l

ऋग्वेद में पृथ्वी की उत्पत्ति का कारण काम ही माना गया है और उसे परब्रह्म के हृदय से जनित बताया है[4] अतः काम की उत्पत्ति अलौकिक है न कि लौकिक l लौकिक हेतुओं की सिद्धि हेतु काम से ही अन्य प्रजा जन्म लेती हैं l उपनिषद में भी इसका प्रतिपादन हुआ है l

सोऽकामयत बहुस्यां प्रजायेत l

काममय एवायं पुरुषः ll – तैत्तिरीयोपनिषद्

श्रीमद्भगवद्गीता में भी भगवान् श्रीकृष्ण ने कहा है कि “समस्त प्राणिजगत् में धर्म के अनुरूप जो भी काम है वह मैं ही हूँ” l [5] “अहं सर्वस्य प्रभवः” बोल कर गीता में, कृष्ण, स्वयं को जगत् की उत्पत्ति का मूल कारण बताते है अतः कामरूप बीज स्वयं को ही बताते है l

पौराणिक साहित्य (पुराण आदि) एवं लौकिक साहित्य (कालिदास, माघ आदि का साहित्य) में काम को देव की उपाधि प्राप्त होती है और उसे नाट्यशास्त्र में भी स्थान प्राप्त होता है l समय का चक्र काम को शिल्प-स्थापत्य में भी स्थानप्राप्ति देता है और साथ साथ शास्त्रपरम्परा में भी l पुरुषार्थचतुष्ट्यम् में धर्म और अर्थ के बाद काम को स्थान मिलता है और बाद में मोक्ष को l व्याकरण के अनुसार सर्वप्रथम धर्म, तत्पश्चात् अर्थ, काम और मोक्ष शब्द होने चाहिए ऐसा कोइ नियम नहीं है, किन्तु सर्वप्रथम अर्थ शब्द होना चाहिए, यद्यपि यह क्रम निश्चित हुआ है जो मुक्ति (मोक्ष) से पूर्व काम की उपयोगिता दर्शित करता है l मुक्ति मानवजीवन का सर्वोच्च ध्येय है किन्तु काम की उपेक्षा कर के नहीं क्योंकि काम (धर्मानुरूप) मानवी के लिए मोक्ष में बाधक नहीं अपितु सहायक है l

शास्त्रोक्त और आज रूढिगत हो चुके षोडश संस्कारों में वर्णित गर्भाधान, पुंसवन और विवाह जैसे संस्कारों से काम का महत्त्व देखने को मिलता है l

गर्भाधान संस्कार – गर्भाधान का सामान्य अर्थ है “धर्मपत्नी के गर्भ में बीज का आरोपण करना” और उस से उत्पन्न संतान ही औरस संतान होती है l इसी संतान से माता-पिता के धर्म एवं अन्य जीवनकार्य (अर्थ आदि) जुडे होते हैं अतः कामप्रेरित व धर्मानुकूल गर्भाधान से जन्य संतति माता-पिता के पुरुषार्थों की वाहक होती है l गृहस्थाश्रम का यह कार्य ही आगे सन्यासाश्रम में मोक्षप्राप्ति तक ले जाता है l

पुंसवन संस्कार सामान्यतया, गर्भ रहने के तीन या चार माह बाद, संतति के दोषरहित जन्म हेतु किए जाते है l यहाँ भी संतति के जन्म हेतु ‘कामना’ की जाती है जिसे शास्त्रोक्त विधि से अभिषिक्त किया जाता है l

विवाह संस्कार – चारों आश्रमों में गृहस्थाश्रम का महत्त्व सर्वाधिक है और मनु ने उसे अन्य सभी आश्रमों का आधार बताया है[6] तथैव विवाह गृहस्थाश्रम का प्रमुख संस्कार माना गया है l विवाह को वैदिक साहित्य में ‘यज्ञ’ की श्रेणी में रखा गया है[7] और उसका मुख्य उद्देश्य संतानप्राप्ति (वंशप्राप्ति) है जिस की पूर्ति हेतु धर्माधारित काम का आचरण अनिवार्य है l यहाँ दो शब्दों का भेद जानना अत्यावश्यक होगा – काम और यौन.

  • संतति की प्राप्ति हेतु शारीरिक सम्बन्ध स्थापित होता है तो उसे कामसम्बन्ध कहा जाता है l
  • शारीरिक सम्बन्ध का हेतु संततिप्राप्ति न हो कर केवल आनन्दप्राप्ति हो तो वह यौनसम्बन्ध है l

निष्कर्ष – वैदिक शास्त्रों में वर्णित दैवी काम, जो जगत् और प्रजा की उत्पत्ति का कारण है, पौराणिक शास्त्रों में देवत्व को प्राप्त होता है और आगे चल कर साहित्य में और कलाओं में भी यथायोग्य स्थान को प्राप्त होता है l श्रुति और स्मृति दोनों प्रकार के ग्रन्थों में काम को अन्य तीन पुरुषार्थों का पूरक माना है और मुख्य सोलह संस्कारों में भी काम का प्रमुख स्थान है अतः धर्मानुकूल काम सदैव ही समाज का एक महत्व का अङ्ग रहा है l

कामशास्त्र का उद्गम

अथर्ववेद के विवाह प्रकरण सूक्त में कामशास्त्र की संकल्पना के बीज मिलते हैं[8] जहाँ अग्निदेव से प्रार्थना की जाती है कि वह नवविवाहिता स्त्री को सुसंतति प्रदान करे l अथर्ववेद के इसी सूक्त की एक ऋचा में सूर्यपुत्री को उत्तम संतति को जन्म देने हेतु प्रसन्नचित्त हो कर पति के साथ समागम के लिए शैया पे आने को कहा जाता है l [9]

 छान्दोग्य उपनिषद में यही संकल्पना विकसित हुई है l वहाँ स्त्री-संभोग को ‘सामवेद का गान’, स्त्री को प्रसन्न करने की क्रिया को ‘प्रस्ताव’, स्त्री के साथ शयन को ‘उद्गीथ’, संभोग को ‘प्रतिहार’ और मैथुनक्रिया के अन्त में होते वीर्यस्खलन को ‘निधन’, प्रायः अन्त में समूह में होता सामवेद का गान, कहा गया है l [10]

अतः कामशास्त्र का मूल वैदिक साहित्य में प्राप्त होता है जो आगे जाकर शास्त्र के रूप में विकसित होता है l

कामशास्त्र का प्रयोजन

काम का धर्माधारित होना अत्यावश्यक है यह हमने देखा l अभी यक्ष प्रश्न यह है कि धर्म-आधारित काम क्या है ? उससे हम अवगत कैसे हो ? विभिन्न सामाजिक परिस्थितियों में धर्माधारित काम क्या होगा ? क्योंकि काम धर्माधारित है अतः वह प्रत्येक व्यक्ति के लिए प्रत्येक परिस्थिति में समान न रहकर भिन्न रूपों में होगा l ऐसे अनेक प्रश्न एवं संशयों के निवारण हेतु शास्त्र का होना अनिवार्य है और यही है काम आधारित शास्त्र अर्थात् कामशास्त्र का प्रयोजन l

शास्त्र की एक सर्वमान्य व्याख्या है – शास्ति च त्रायते च इति शास्त्रम् – जो अनुशासन और रक्षा प्रदान करे वह है शास्त्र l काम यदि मर्याद व अनुशासित न रहे तो वह प्रथम व्यक्ति के और तत्पश्चात् समग्र समाज के पतन का कारण बनता है l इतिहास में अमर्याद काम से नष्ट होते व्यक्ति के अनेक उदाहरण प्राप्त होते हैं जिनसे संदेश यही मिलता है कि काम अनुशासित और मर्यादा में ही होना उचित है l धर्माधारित और मर्यादारत काम घर में, कुल में और समाज में अनुशासन बनाए रखता है जिस से व्यभिचार, भ्रष्टाचार आदि पे नियन्त्रण रहता है, शान्ति बनी रहती है और समाज रक्षित रहता है l श्रीमद्भगवद्गीता में अर्जुन ने कहा है – अधर्म आधारित काम से वर्णसङ्कर प्रजा का जन्म होता है जो प्रथम कुल को, तत्पश्चात् जाति को, तत्पश्चात् समाज को नष्ट करती हैं l [11]

काम को शास्त्र के रूप में वर्णित करनेवाला प्राचीनतम ग्रन्थ जो आज प्राप्य है वह है मुनि वात्स्यायन प्रणीत कामसूत्र l कौन थे वात्स्यायन और क्यों उन्होंने कामसूत्र की रचना की ?

वात्स्यायन और कामसूत्र की रचना

वात्स्यायन

विद्वानों के मतानुसार वात्स्यायन वत्स गोत्र में उत्पन्न संतान का निर्देशक है – वत्सस्य गोत्रापत्यम् वात्स्यायनम् l गौड ब्राह्मणों के एक गोत्र का नाम वत्स है अतः वात्स्यायन वास्तविक नाम न होने की विशेष संभावना है l संस्कृत गद्यकार सुबन्धु रचित “वासवदत्ता” में कामसूत्र के रचयिता का नाम ‘मल्लनाग’ दिया है और यही नाम कामसूत्र के प्रसिद्ध टीकाकार यशोधर ने भी अपनी टीका में दिया है l अतः वात्स्यायन का वास्तविक नाम मल्लनाग होने के प्रमाण भी प्राप्त है l एक और वात्स्यायन भी है जिसने न्याय पे भाष्य लिखा है l विद्वानों के मतानुसार कामसूत्र और न्यायभाष्य – दोनों का कर्ता एक ही व्यक्ति हो सकता है l कामसूत्र में यथोचित स्थान पे रचनाकार “इति वात्स्यायनः” कह कर अपना मत प्रकट करता है अतएव कामसूत्र के रचयिता के रूप में वात्स्यायन नाम ही प्रचलित हुआ है l

कामसूत्र का उल्लेख सुबन्धु के ‘वासवदत्ता’ में और भरतमुनि के ‘नाट्यशास्त्र’ में प्राप्त होता है l कालिदास की कृतिओं में और अन्य सभी परवर्ती साहित्य में भी कामसूत्र का प्रभाव स्पष्ट देखने को मिलता है अतः कामसूत्र न केवल एक प्राचीन शास्त्र है अपितु साहित्य में भी उसको यथोचित स्थान प्राप्त है l

कामसूत्र की रचना

कामसूत्र के प्रारम्भिक सूत्रों में ही कामसूत्र की रचना कैसे हुइ उसका विवरण प्राप्त होता है जिसका संक्षिप्त रूप है – प्रजापति ब्रह्मा द्वारा एक लक्ष (लाख) अध्यायों से युक्त शास्त्र का सर्जन होता है जिसमें से धर्मशास्त्रविषयक अंश को मनु, अर्थशास्त्रविषयक अंश को बृहस्पति और महादेव के अनुचर नन्दी द्वारा सहस्र (1000) अध्यायों से युक्त कामशास्त्रविषयक अंश को पृथक् किया गया l शिव-पार्वती के विवाह पश्चात् उनके रतिसुख के समय पे नन्दी द्वारा इस ग्रन्थ की रचना बताई गई है l

आरुणि उद्दालक का पुत्र श्वेतकेतु सहस्र अध्यायों को पाँच सौ (500) अध्यायों में संक्षिप्त करता है l प्रायः यह वही श्वेतकेतु है जिसने विवाह परम्परा को स्थापित किया था l बभ्रु का पुत्र बाभ्रव्य इसे एक सौ पचास (150) अध्यायों में संक्षिप्त करता है और साथ में सात अधिकरणों में विभक्त भी करता है l बाभ्रव्य के परवर्ती साहित्यकारों द्वारा एक एक अधिकरण पे स्वतन्त्र कामाधारित शास्त्रों की रचना होती है अतः अन्त में शास्त्र एक न रह कर विभक्त रूपों में विस्तारित हो जाता है l बाभ्रव्य से पूर्ववर्ती आचार्यों के शास्त्र भी लुप्त हो जाते हैं अतः संपूर्ण कामशास्त्र का अध्ययन होना अशक्य हो जाता है और अन्त में वात्स्यायन द्वारा बाभ्रव्य के प्रायः लुप्त सातों अधिकरणों को ही आधार बनाकर कामसूत्र की रचना होती है जिसमें संक्षिप्तता भी हो और पूर्णता भी l नन्दी से वात्स्यायन पर्यन्त इस शास्त्र का नाम ‘कामसूत्र’ ही होता है जो ध्यानपात्र मुद्दा है l

कामशास्त्र की ग्रन्थपरम्परा

कामसूत्र की रचना के पश्चात् कामशास्त्र की ग्रन्थपरम्परा का उद्भव हुआ जिसका आधार नित्य कामसूत्र ही रहा l प्राप्त-अप्राप्त अनेक ग्रन्थ इस ग्रन्थपरम्परा में प्राप्त होते हैं जिसमें से कुछ निम्नलिखित हैं –

1) अनङ्गतिलक 2) अनङ्गदीपिका               3) अनङ्गरङ्ग

4) अनङ्गशेखर             5) कन्दर्पचूडामणि             6) कादम्बरस्वीकरणकारिका

7) कादम्बरस्वीकरणसूत्र   8) कामकल्पलता              9) कामतन्त्र

10) कामप्रकाश           11) कामप्रबोध                 12) कामरत्न

13) कामसमूह             14) कामसार                  15) कामाप्राभृतक

16) कामानन्द             17) केलिकुतूहल               18) पञ्चसायक

19) प्रणयचिन्ता            20) मदनसंजीवनी             21) मदनार्णव

22) मनसिजसूत्र           23) मन्मथसंहिता              24) रतिकल्लोलिनी

25) रतिचन्द्रिका           26) रतिनीतिमुकुल            27) रतिरत्नप्रदीपिका

28) रतिरहस्य              29) रतिरहस्यदीपिका          30) रतिरहस्यार्णव

31) रतिसर्वस्व             32) रतिसार                   33) रसचन्द्रिका

34) वात्स्यायनसूत्रसार     35) वेश्याङ्गनाकल्पद्रुम         36) शृङ्गारकन्दुक

37) शृङ्गारदीपिका         38) शृङ्गारमञ्जरी               39) शृङ्गारसार

40) सदर्पकन्दर्प           41) स्त्रीविलास                 42) स्मरदीपिका

कामसूत्र का संदेश –

कामसूत्र की रचना को ले कर संदेश वात्स्यायन ने इस ग्रन्थ में अन्तिम चरण में निर्दिष्ट किया है जो निम्नलिखित है और प्रायः लोग उस पर ध्यान नहीं देते –

1] पूर्ववर्ती कामसूत्र के ग्रन्थ एवं उनके रचयिताओं के विभिन्न मतों का अध्ययन करके एवं स्वबुद्धि से चिन्तन करके ही वात्स्यायन ने कामसूत्र की रचना कि है l [12]

2] इस कामशास्त्र को जाननेवाला व्यक्ति निश्चय ही धर्म, अर्थ, काम, विश्वास और लोकाचार को ध्यान में रख कर ही प्रवृत्त होगा, राग या कामुकतावश नहीं l [13]

3] कामसूत्र में धर्मविरुद्ध कामक्रियाओं का उल्लेख अवश्य है किन्तु वह कुछ क्षेत्रों की लोकप्रचलित रूढियों से विशेष नहीं हैं और उसे विवेचन के पश्चात् निषिद्ध घोषित भी कर दिया गया है l [14]

4] कामसूत्र की रचना ब्रह्मचर्य व समाधि द्वारा लोकव्यवहार को सुचारु रूप से चलाने के लिए हुइ है अतः इस ग्रन्थ के विधान रागमूलक नहीं समझना चाहिए l [15]

5] कामशास्त्र के तत्वों को समझनेवाला व्यक्ति काम की यथायोग्यता को लेकर जितेन्द्रिय हो जाता है l [16]

कामसूत्र के अन्तिम सूत्र में वात्स्यायन कामसूत्र का मुख्य उद्देश्य भी स्पष्ट करते है कि – जो भी व्यक्ति रागात्मक भाव से इस शास्त्र का अध्ययन व प्रयोग करेगा उसे सिद्धि कदापि प्राप्त नहीं होगी किन्तु विवेक से किए गए अध्ययन व प्रयोग से पूर्णसिद्धि प्राप्त होगी l [17]

उपसंहार 

  1. उपरोक्त बिन्दुओं से यह प्रमाणित होता है कि कामशास्त्र का आधार धर्म है और उसकी रचना का उद्देश्य सामाजिक व्यवस्था है न कि व्यभिचार की वृद्धि l
  2. वात्स्यायन ने धर्म को सर्वाधिक महत्ता दी है अतः काम धर्म का विरोधी नहीं है अपितु धर्म पे ही आधारित है l
  3. कामसूत्र में वात्स्यायन ने मत दिया है कि – धर्म संसार का नियामक है अतः वह पुरुषार्थों का मूल है और अर्थवृत्ति भी धर्माधारित ही होनी चाहिए तत्पश्चात् धर्माविरुद्ध काम का सेवन इच्छनीय है अतः कामशास्त्र अमर्याद या उच्छृंङ्खल काम की अनुमति नहीं देता l
  4. कामसूत्र का अध्ययन व प्रयोग विवेक आधारित होगा तभी समाज में अनुशासन रहेगा अन्यथा अराजकता और व्यभिचार की वृद्धि होगी l
  5. कामसूत्र और काम के अन्य ग्रन्थ, शास्त्र की एक विशाल श्रेणी के अन्तर्गत आते हैं अतः उनका अध्ययन शास्त्रोक्त विधि से होना चाहिए न कि सामान्य भाषान्तर के पठन द्वारा l यदि ऐसा न हुआ तो अर्थ का अनर्थ होना निश्चित है और शास्त्र का प्रयोजन ही विफल हो जाएगा l

वात्स्यायन के एक सूत्र से इस लेख को पूर्ण कर रहा हूँ –

ll सा चोपायप्रतिपत्तिः कामसूत्रादिति वात्स्यायनः ll – कामसूत्रम् 1.2.19

(दाम्पत्य जीवन को सफल बनाने के उपायों का परिज्ञान कामसूत्र से ही होता है)

[1] अमरकोशः

[2] कामः मनसः रेतः (ऋग्वेदः 10.129.3, नासदीयसूक्तम् )

[3] कामसूत्रम् 2.1.11

[4] ऋग्वेदः 10.129.4, नासदीयसूक्तम्

[5] धर्माविरुद्धो भूतेषु कामोऽस्मि भरतर्षभ, श्रीमद्भगवद्गीता 7.11

[6] यथा वायुं समाश्रित्य वर्तन्ते सर्वजन्तवः l

तथा गृहस्थं आश्रित्य वर्तन्ते सर्वाश्रमाः ll – मनुस्मृतिः 3.77

[7] अयज्ञियो ह वा एष योऽपत्नीकः l (तैत्तिरीयब्राह्मणम् 2.2.2.6)

[8] अथर्ववेदः 14.2

[9] आ रोह तल्पं सुमनस्यमानेह प्रजां जनय पत्ये अस्मै, अथर्ववेदः 14.2.31/32

[10] उपमन्त्रयते स हिंकारो ज्ञपयते स प्रस्तावः स्त्रिया सह शेतेस उद्गीथः त्रीं सहोते स प्रतिहारः कालं गच्छति तन्निधनं पारं गच्छति    तन्निधनमेतद्वामदेव्यं मिथुने प्रोक्तम् l – छान्दोग्योपनिषद् 2.13.1

[11] अधर्माभिभवात्कृष्ण प्रदुष्यन्ति कुलस्त्रियः l

स्त्रीषु दुष्टासु वाष्णेय जायते वर्णसङ्करः ll 1.41 ll

सङ्करो नरकायैव कुलघ्नानां कुलस्य च पतन्ति ll 1.42 ll

दोषैरेतैः कुलघ्नानां वर्णसङ्करकारकैः l

उत्साद्यन्ते जातिधर्माः कुलधर्माश्च शाश्वताः ll 1.43 ll

[12] कामसूत्रम् 7.2.52, 7.2 .56

[13] कामसूत्रम् 7.2.53

[14] कामसूत्रम् 7.2.54

[15] कामसूत्रम् 7.2.57

[16] कामसूत्रम् 7.2.58

[17] कामसूत्रम् 7.2.59

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